देहरादून के पॉश इलाके से करोड़ों रुपये का सरकारी खाला चोरी!

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देहरादून के पॉश इलाके से करोड़ों रुपये का सरकारी खाला चोरी!
गौरव तिवारी,जागो ब्यूरो रिपोर्ट:

क्या आप यकीन कर सकते हैं कि उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में,एक सरकारी खाला/गधेरे की जमीन,जिसे पूर्व में नाप भूमि होना बताया जा रहा है,के मालिक द्वारा प्राप्त मुआवज़े के 30 हजार रुपये वापस कर उसे दोबारा 35 करोड़ में बेचा गया है!जी हाँ ये मुमकिन हुआ है!सरकार में बैठे हुक्मरान कैसे सरकारी मशीनरी को अपने हाथों की कठपुतली की तरह इस्तेमाल करते हैं,इसका ये हैरतअंगेज जीता जागता उदाहरण है!सरकारी खाले की जमीन को न केवल बेचा गया वरन बाद में उसे भ्रष्ट सिस्टम की मिलीभगत से व्यावसायिक ज़मीन बना कर उस पर लग्जरी अपार्टमेंट भी खड़े कर दिए गये हैं औऱ आज ये सरकारी खाला अरबों की व्यावसायिक सम्पति में परिवर्तित हो चुका है!मामला देहरादून रेसकोर्स का है,जहां एक खाला,जिसका खसरा नम्बर 165 रकबा 0.376 है० और जो आज भी नॉनजेडए खतौनी में खाला ही दर्ज है,सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इस खाले को 15-09-1987 को एक सरकारी आदेश द्वारा राज्य सरकार की भूमि के रूप में निहित कर दिया गया था,मुआवजे के दस्तावेजों के अनुसार खाले के 5988 वर्ग मीटर क्षेत्रफल का मुआवजा 1987 में हरदेव सिंह द्वारा 8234 रुपये मे ले लिया गया था, जिसका गजट नोटिफिकेशन 1987 में हो चुका था,मगर अब खेल देखिये कि मुआवजा लेने के बाद जब यह खाला जो अब राज्य सरकार में निहित हो चुका है,2007 में हरदेव सिंह द्वारा आनंद एसोसिएट शालीमार बाग नई दिल्ली एवं रेसकोर्स देहरादून हरभजन सिंह इत्यादि को बेच दिया गया!

यह वाद 2008 में जिला माजिस्ट्रेट के समक्ष पहुँचा तो जिला माजिस्ट्रेट ने अपनी रिपोर्ट में इसे राज्य सम्पति घोषित किया,उसके बाद हरदेव सिंह हाईकोर्ट गया,जबकि वह खुद इस जमीन को 2007 में आनंद एसोसिएट को बेच चुका था,आरोप है कि कोर्ट में तथ्यों को छुपा कर और तोड़मरोड़ कर पेश कर खसरा संख्या 165 को नाप भूमि बताया गया,जबकि यह अब राज्यसम्पति की भूमि एक खाला है!कोर्ट ने आदेश दिए कि इस भूमि का मुआवजा वापस लिया जा सकता है,11 मई 2013 को इस जमीन का 30840 रुपये मुआवजा वापस कर दिया गया, जबकी यह खाला 35 करोड़ रुपये में वर्ष 2007 में पहले ही आनंद एसोसिएट व अन्य को बेचा जा चुका था!

अब इस समय अगर वास्तविक स्थिति देखें तो खाले पर अब लग्जरी अपार्टमेंट बन चुके है,जबकि जमींदारी विनाश अधिनियम की धारा 132 साफ़ तौर पर कहती है कि नदी ,नाले, खाले, तालाब पर किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं हो सकता और न ही इसका स्वरूप बदला जा सकता है।मगर सारे नियम कायदे दरकिनार करते हुये आपसी मिली भगत से आज खाला ढूंढे से नहीं मिलता,क्योंकि उसपर लग्जरी अपार्टमेंट बन चुके है,इस अपार्टमेंट में भाजपा के कुछ सफेद पोश लोगों के फ्लैट भी हैं,जिसका संरक्षण पूरी तरह इस प्रकार के अतिक्रमणकारियों को प्राप्त हो चुका है,अब सवाल यह उठता है कि जब मुआवजा 2013 में वापस किया गया और 2008 में जिला माजिस्ट्रेट के यहां चले वाद की रिपोर्ट यह कहती है कि यह खाला राज्यसम्पति की भूमि है,तो फिर 2007 में कैसे यह भूमि आनन्द एसोसिएट को कैसे बेच दी गयी?दूसरा सवाल यह उठता है कि जब खाले में किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं हो सकता न उसका स्वरूप बदला जा सकता है तो आज उस पर कैसे एमडीडीए ने लग्जरी अपार्टमेंट बनाने की अनुमति दे दी? फिलहाल यह पूरा प्रकरण गहन जाँच का विषय बन चुका है,जाँच के बाद करोड़ो की सरकारी भूमि को कब्जाने के इस खेल से जुड़े कई सफेदपोश नेताओं के चेहरे भी उजागर हो सकते हैं!

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