गढ़वाली लोकसंस्कृति व लोककथा से समझिए जीवन के विविध रंगों से भरी”काफल पाको मिल नि चाखो” के पीछे की कहानी!..

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गढ़वाली लोकसंस्कृति व लोककथा से समझिए जीवन के विविध रंगों से भरी”काफल पाको मिल नि चाखो” के पीछे की कहानी!..
भाष्कर द्विवेदी जागो ब्यूरो रिपोर्ट:

काफल हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाना वाला एक पहाड़ी फल है,यह दिखने में कुछ कुछ शहतूत की तरह होता है,लेकिन इसका आकार शहतूत से काफी बड़ा होता है।काफल गर्मियों का लोकप्रिय फल है,क्योंकि इस दौरान यह पक कर अपने हरे रंग से लाल और हल्के काले रंग में बदल जाता है,यह फल दिखने में काफी सुंदर होता है।

इस फल का वानस्पतिक नाम है ‘मिरिका एस्कलेंटा” और अंग्रेजी में इसका नाम Bay-Barry है,काफल एक ऐसा फल जिसका नाम सुनते ही स्थान विशेष उत्तराखण्ड के लोगों का मन अनुपम आनंद से भर उठता है। इस फल का महत्त्व इसी बात से आँका जा सकता है, कि यह वहाँ के लोगों के मन में इस प्रकार छाया है कि लोक गीत-संगीत,लोक कथाएँ भी इसके बिना अधूरी सी हैं।आइए जानें काफल पाको और इसके पीछे जुड़ी कहानी..इस फल से एक रोचक कहानी जुड़ी हुई है, कहा जाता है कि उत्तराखण्ड के एक गाँव में एक गरीब महिला और उसकी बेटी रहती थी,उनके परिवार में वो दोनों ही एक दूसरे का सहारा थी, उस महिला के पास थोड़ी-सी जमीन के अलावा कुछ नहीं था, जिससे बमुश्किल उनका गुजारा चलता था,गर्मियों में जैसे ही काफल पक जाते वह महिला ओर उसकी बेटी बेहद खुश हो जाया करते थे,उससे घर चलाने के लिए एक आय का जरिया मिल जाता था,इसलिये वह जंगल से काफल तोड़कर उन्हें बाजार में बेचा करती थी,एक बार यूँ ही वह महिला जंगल से एक टोकरी भरकर काफल तोड़कर लायी,वह वक़्त सुबह का था,उसे जानवरों के लिए चारा लेने जाना था इसलिए उसने काफल को शाम को बेचने का इरादे से लायी थी और अपनी बेटी को बुलाकर काफल की पहरेदारी करने को कहा और हिदायत दी कि जब तक मैं जंगल से नहीं आती तब तक काफल मत खाना!मैं खुद तुम्हें बाद में काफल खाने को दूँगी,माँ की बात मानकर बेटी काफलों की पहरेदारी करने करती रही,इसके बाद कई बार रसीले काफलों को देखकर उसके मन में लालच आया पर माँ की बात मानकर खुद पर काबू कर बैठे रही,दिन में जब माँ जंगल से वापस आयी तो देखा कि काफल का तिहाई भाग कम था और पास में ही उसकी बेटी सो रही थी ,सुबह से काम पर लगी माँ को ये देखकर गुस्सा आ गया उसे लगा कि उसके मना करने के बावजूद भी उसकी बेटी ने काफल खा लिये,गुस्से में माँ ने घास का गट्ठर एक तरफ फेंका और सोती हुई बेटी को गुस्से में उठाया और पूछा की काफल कम कैसे हुये?तूने खाये हैं न इस पर बेटी ने बार बार मना किया लेकिन माँ ने बेटी की एक न सुनी और उसे खूब पीटा इतना कि वो अधमरी सी हो गयी और एक और प्रहार से वो आँगन में गिरी और उसका सिर आंगन में पड़े पत्थर से लग गया और उसकी वहीं मौत हो गयी,माँ अपनी बेटी की मौत देखकर रोते-रोते पागल सी हो गई ,वहीं दूसरी तरफ शाम होते-होते काफल की टोकरी पूरी भर गई जब महिला की नजर टोकरी पर पड़ी तो उसे समझ में आया कि दिन की चटक धूप और गर्मी के कारण काफल मुरझा जाते हैं और शाम को ठंडी हवा लगते ही वह फिर ताजे हो जाते हैं, तब उस अभागी माँ को अपनी गलती पर बेहद पछतावा हुआ और वह भी उसी पल सदमें से वो भी गुजर गयी,कहा जाता है कि वो दोनों माँ बेटी चिड़िया बन गई और उस दिन के बाद से एक चिड़िया चैत के महीने में “काफल पाको मिन नि चाख्यो” कहती है जिसका अर्थ है कि “काफल पक गये,मैंने नहीं चखे”और दूसरी चिड़िया गाते हुए उड़ती है “पूर पुतई पूर पूर”जिसका अर्थ है पूरे हैं बेटी पूरे हैं और ये पिछले कई सालों से निरंतर हमारे आसपास चैत मास में सुनाई देता है,जो उस हादसे का सबब है हम सबके लिए कि जल्दबाजी और दूसरों की बातों को समझें बिना जल्दबाजी में कोई निर्णय न लिया जाए,”जागो उत्तराखण्ड”के साथ ऐसी ही प्रेरणादाई खबरों और जानकारियों के लिए आप हमारे फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल को भी लाइक और फोलो कर सकते हैं।

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