मालिनी नदी के फ्लड जोन में पार्क बनाकर क्या भारतवर्ष के नामकरणस्थल कण्वाश्रम को नेस्तानाबूत करना चाहता है उत्तराखण्ड पर्यटन!

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मालिनी नदी के फ्लड जोन में पार्क बनाकर क्या भारतवर्ष के नामकरणस्थल कण्वाश्रम को नेस्तानाबूत करना चाहता है उत्तराखण्ड पर्यटन!
जागो ब्यूरो विशेष:

वह जगह जिसके नाम पर देश का नाम भारतवर्ष पड़ा, उत्तराखण्ड का पर्यटन विभाग उस जगह को ही नेस्तानाबूत करने पर उतारू है!जी हां पौड़ी जनपद के कोटद्वार क्षेत्र में पर्यटन विभाग कण्वाश्रम के पास बहने वाली मालिनी नदी के फ्लड जोन में एक पार्क निर्मित करना चाहता है,करीब 25 करोड़ की लागत से बनने वाला यह पार्क मालिनी नदी के फ्लड जोन में बनाया जाना प्रस्तावित है,जिससे मालिनी नदी के पानी का बहाव रुकने से कण्वाश्रम मन्दिर और उससे लगे क्षेत्र के साथ ही इस पार्क के ख़ुद भी बरसात में तेज बहाव में बह जाने की पूरी संभावना है!जिससे इस पौराणिक स्मारक क्षेत्र में जन-धन,पशु-धन और पर्यावरण आदि को भारी नुकसान होने के साथ ही पार्क को बनाने में लगने वाली भारी-भरकम धनराशि भी नदी के पानी के साथ बह जायेगी!दरअसल यह क्षेत्र वही इलाका है,जँहा महर्षि कण्व ऋषि के आश्रम में शकुन्तला और दुष्यन्त की प्रेम कहानी पल्लवित हुयी, जिसकी परिणति एक प्रतापी पुत्र राजा “भरत” के रूप में हुयी,जिनके नाम पर देश का नाम “भारतवर्ष” पड़ा,मौर्य साम्राज्य में भारत आये ग्रीक यात्री मेगस्थनीज भी अपनी पुस्तक इंडिका में भी इस इलाके और मालिनी नदी का जिक्र विशेष रूप से करते हैं,लेकिन हैरानी है कि इस प्राचीन धरोहर का महत्व न समझते हुये उत्तराखण्ड के पर्यटन विभाग ने पहले तो इस स्थान पर झील बनाने का प्रस्ताव बनाया,जिसके लिये बाकायदा भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से भूमि को वन विभाग से पर्यटन विभाग के नाम हस्तान्तरित किया गया,लेकिन कुछ वर्ष पूर्व मालिनी नदी में बाढ़ आने के उपरान्त स्थानीय लोगों के विरोध के बाद इस प्रोजेक्ट को ड्राप कर दिया गया,लेकिन अब यँहा पर पर्यटन विभाग की पार्क बनाने की योजना है,अर्थात भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय से झील बनाने की अनुमति लेकर पार्क बनाकर साफ़-साफ़ धोखाधड़ी करना!यह स्थान पुरातात्विक अवशेषों से भी भरा हुआ है,बेहतर होता कि पर्यटन और पुरातत्व विभाग विभाग मिलकर यँहा विशेषज्ञों की देखरेख में ख़ुदाई करवाकर प्राचीन काल के कई और महत्वपूर्ण रहस्यों का खुलाशा करते और ख़ुदाई में प्राप्त उस कालखण्ड की कलाकृतियों व अवशेषों को यंही म्यूजियम बनाकर इन अमूल्य धरोहरों को संरक्षित करते! जानकारी प्राप्त हुयी है कि पूर्व में भी इस इलाके में कई बेहतरीन कलाकृतियां प्राय हुयी हैं,जिन्हें वन विभाग के अफसरों ने या तो गैरकानूनी ढंग से निजि संस्थानों को बेच दिया है,या वे चोरी हो गये हैं!जिनमें से कुछ एक अभी भी लापरवाही से कण्वाश्रम मन्दिर के अहाते में भगवान भरोशे पड़ा देखा जा सकता है,इन कलाकृतियों और अवशेषों को यदि म्यूजियम में संरक्षित किया जाता तो इन्हें देखने देश-विदेश से पर्यटको का यँहा पहुँचते और इस तरह के पर्यटन के आर्थिक-सामाजिक लाभ भी स्थानीय लोगों को मिलते,लेकिन अब इसके उलट यँहा पार्क बनने से इस क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था का बर्बाद होना तय है,जिससे बड़े क्षेत्र में खेती पर निर्भर ग्रामीणों की आर्थिकी भी चरमरा जायेगी,एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस स्थान का मूल नाम चौकीघाट है,जँहा पर मृतकों का दाहसंस्कार भी किया जाता है,ऐसी जगह पर मनोरंजन के लिये एक पार्क बनाकर पर्यटन विभाग कौन सी मानवीय भावनाओं के प्रति संवेदनाएं प्रदर्शित करना चाहता है?ये भी समझ से परे है!उत्तराखण्ड सरकार और पर्यटन विभाग द्वारा इन सभी मुद्दों पर गंभीरता से चिंतन न करते हुए बिना स्थानीय जनता की राय जाने हुये जबरन पार्क का निर्माण करने से मजबूर होकर एक स्थानीय व्यक्ति,किशन सिंह नेगी ने उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है,जिस पर माननीय न्यायालय के समक्ष पर्यटन विभाग और सिंचाई विभाग ने पार्क के निर्माण के सम्बन्ध में विरोधाभासी पक्ष रखें हैं,सिंचाई विभाग भी इस बात को पुख़्ता रूप से कह रहा है,कि इस स्थान पर पार्क का निर्माण इलाक़े की सिंचाई व्यवस्था को तो चौपट करेगा ही,साथ ही इलाक़े में बाढ़ का ख़तरा भी पैदा करेगा!मज़े की बात ये भी है कि दोनों विभागों के मन्त्री सतपाल महाराज ही हैं,जो स्वयं एक धर्मगुरु होते हुये इस धर्मक्षेत्र से खिलवाड़ पर विस्मयकारी ढंग से मौन हैं!वर्तमान में कण्व आश्रम ,स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश के 10 धरोहर स्थानों में चयनित हो गया है,इसलिये अब इसके विकास के लिये फंड्स की भी कमी नहीं है,लेकिन मुद्दा यह है कि इस भारी फण्ड का प्रयोग स्थानीय नेताओं के गुर्गों को ठेकेदारी लाभ देने के बजाय,एक दूरगामी सोच के साथ कण्व आश्रम को देश के महत्वपूर्ण हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित करने में किया जाय,कण्व आश्रम विकास समिति के अध्यक्ष रिटायर्ड कर्नल रावत जो मालिनी नदी के फ्लड जोन में पर्यटन विभाग द्वारा पार्क बनाकर यँहा हर वर्ष होने वाले मेले के मेला क्षेत्र को भी अतिक्रमित करने के भी ख़िलाफ़ हैं,ने “जागो उत्तराखण्ड” से इन्ही ने सभी मुद्दों पर खुलकर बातचीत की,साथ ही “जागो उत्तराखण्ड” ने उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता नवनीष नेगी से भी मामले का न्यायालय में स्टेटस जानने का प्रयास किया,जिसमे पता चला है कि माननीय उच्च न्यायालय ने फिलहाल पार्क के निर्माण पर,उत्तराखण्ड के फ्लड जोनिंग एक्ट के साफ उल्लंघन,जो कि नदी से लगे हुये इलाके में किसी भी तरह की मानव गतिविधि और निर्माण की इज़ाजत नहीं देता!का संज्ञान लेते हुये रोक लगा दी है और प्रोजेक्ट को फण्ड कर रही एशियन डेवलेपमेंट बैंक की कार्यदायी संस्था आईडीआईपीटी को प्रोजेक्ट के मॉडल सर्वे की रिपोर्ट माननीय न्यायालय में पेश करने का आदेश दिया है,जिससे माननीय न्यायालय इस स्थान पर पार्क के निर्माण के बारे में अन्तिम फ़ैसला ले सके!भावनात्मक रूप से भी महसूस किया जा सकता है कि माननीय न्यायालय के इस मामले में फैसले पर स्थानीय लोगों,जागरूक बुद्धिजीवियों के साथ इस पौराणिक धरोहर से जुड़े महापुरुषों की आत्माओं की भी नजऱ होगी!

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