आखिर नही हो पाई पहाड़ में शिक्षको की वापसी..

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आखिर नही हो पाई पहाड़ में शिक्षको की वापसी———
जागो ब्यूरो रिपोर्ट:
पहाड़ की संस्कृति सभ्यता को बचाने और और पहाड़ में पहाड़ जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए उत्तराखण्ड राज्य का गठन किया गया था लेकिन उत्तराखंड गठन को 20 साल पूरे होने को हैं फिर भी हालात पहले से भी खराब होते नजर आ रहे हैं । हजारो क्रांतिकारियों और माँ बहनों के बलिदान के द्वारा उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना उत्तराखंड राज्य आज पलायन की मार झेल रहा हैं नए राज्य को जो विकास की उम्मीदे थी आज वो कल्पना सी लगने लगी । पहाड़ से दिन प्रति दिन खाली होते घर सरकार की नीतियों की पोल खोल रहे है । आज पहाड़ में न शिक्षक हैं न ही डॉक्टर हैं अनेक माँ बहनों की बिना इलाज के प्रसूती के समय मौते हो चुकी हैं आज पहाड़ में रहने वाले बाकी बचे लोग भी सोचने को मजबूर है कि ये घटनाएं उनके साथ न हो वो भी पलायन करने को मजबूर है शिक्षक पहाड़ चढ़ने को तैयार नही हैं ।

पहाड़ के नौनिहाल बच्चों की चिंता करे भी तो कौन?आज एक बार फिर सरकार पहाड़ के दुर्गम ग्रामीण इलाको में बसे भोले भाले पहाड़ी लोगो को ऊँचे ऊंचे विकास के सपने दिखाकर पंचायत चुनाव लड़ने जा रही हैं , एक बार फिर शराब और पैसे का लालच दिखाकर भोली भाली जनता को नेताओ द्वारा ठगा जाएगा। आज इसको पलायन की सबसे बड़ी त्रासदी और विडम्बना ही कहेंगे कि पहाडो में बाहर से आकर रहने वाले लोग धीरे धीरे यहां की जमीनों पर अवैध कब्जे जमाने लगे है , स्थानीय जनता के साथ बाहरी लोगों द्वारा की गई अनेको घटनाए सामने आ चुकी हैं , कभी नेपालियों द्वारा तो कभी दूसरे राज्यो के लोगो द्वारा जिनमे बिजनौर , उत्तरप्रदेश के अन्य जिलों के कुछ लोगो द्वारा स्थानीय युवतियों के साथ छेड़खानी की घटनाएं भी घटित हुई हैं और ऐसे ही लोग अब इन पहाड़ी गावो में प्रधान बनने की भी दावेदारी करने लगे है । वो दिन दूर नही जब पहाड़ की सभ्यता और संस्कृति लुप्तप्राय हो जाएगी । अगर पहाड़ की सभ्यता और संस्कृति को बचाना हैं तो सरकार को पहाड़ में व्यवस्थाए दुरुस्त करनी पड़ेगी । आज जो लोग पहाड़ में रहकर पहाड़ को आबाद रखे हुए सरकार को उनकी समस्याओं का समाधान करना पड़ेगा । पहाड़ में रोजगार के अवसर पैदा करने पड़ेंगे और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान देना पड़ेगा । प्रदेश के शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे पहाड़ में शिक्षकों की कमी का रोना रोते रहते है परंतु आश्चर्य की बात हैं जब शिक्षा मंत्री ही शिक्षको की कमी को पूरा नही कर पा रहे है तो फिर उम्मीद किसे से करे? हरीश रावत सरकार में आचार संहिता में आये 500 शिक्षकों की माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में भी आज तक पहाड़ वापसी न होना सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता हैं ।इस प्रकरण पर मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री का अनुमोदन मिलने के बाद भी शिक्षकों की पहाड़ वापसी का आदेश नही किया जा रहा हैं । सूत्रों द्वारा जानकारी मिली हैं कि शासन द्वारा मामले को एक बार फिर पंचायत चुनाव की आचार संहिता की आड़ लेकर लटकाया जा सकता हैं जबकि इसी आचार संहिता के दौरान कई और आदेश भी जारी किए गए है , अभी हाल ही में प्रदेश के सभी विधालयो में संस्कृत शिक्षा को पढ़ना अनिवार्य करने का आदेश जारी किया गया हैं और सरकार ने अभी माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में किसान आयोग का गठन कर उसमें नियुक्तियां की गई हैं । इस प्रकार इस मामले में भी माननीय उच्च न्यायलय का आदेश काफी पहले आ गया था लेकिन फिर मामले को बार बार लटकाया जाता रहा हैं । आपको बता दे कि इससे पूर्व में भी राजनीतिक दबाव के चलते इस मामले को सबसे पहले उत्तराखंड में बोर्ड परीक्षाओं के चलते लटकाया गया और फिर लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के चलते लटकाया गया लेकिन आचार संहिता खत्म होने के बाद भी इनकी वापसी नही की गई और अब एक बात फिर पंचायत चुनाव की आचार संहिता की आड़ लेकर इसको लटकाने का प्रयास विभागीय अधिकारियो द्वारा किया जा रहा हैं । आपको बता दे कि अभी हाल ही में अरविंद पांडे द्वारा सचिवालय में ली गयी शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में इन शिक्षको में से स्थानान्तरण एक्ट के अनुसार गम्भीर बीमार शिक्षको , पति पत्नी और दुर्गम से दुर्गम आये शिक्षको को रोकते हुए बाकी नियम विरुद्ध आये 300 शिक्षको के पहाड़ वापसी के आदेश जारी किए है लेकिन फिर भी इनकी वापसी के आदेश नही हो पाए। इस मामले में जीरो टोलरेंस का दम भरने वाली प्रदेश की डबल इंजन की सरकार अब फेल होती नजर आ रही है।अब पहाड़ की जनता को सोचना होगा की बार बार जनता को धोखा देने वाली सरकार पर कैसे भरोसा करे ? पंचायत चुनाव में सरकार को आईना दिखाना होगा। अब देखना है कि सरकार किन मुद्दों पर पंचायत चुनाव में भोली भाली जनता से वोट मांगने जाएगी????

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