देहरादून की सरहद पार पानी सड़क को भी मोहताज लोग

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देहरादून की सरहद पार पानी सड़क को भी लोग मोहताज

सुदीप कपरवाण,यमकेश्वर

गाँव में नेताजी आते तो हैं,बेशक घोषणाएँ,आश्वासन भी दे जाते हैं,प्रधान से लेकर विधायक, सांसद तक चुनाव पानी,सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के मुद्दों पर जीत भी जाते हैं,लेकिन प्रधान जी जानकारी के अभाव में किसी भी विभाग से काम कैसे करवाना है ?नही करवा पाते!क्या प्रधान जी सिर्फ़ पंचायत बैठक करवाने तक सीमित है?क्या उनका उतरदायित्व नही बनता कि सम्बधित विभाग से कार्य करवाने का तरीका सीखें? किस चीज के प्रतिनिधि हैं आप, जब आप अपने गांव की मूलभूत पानी जैसी समस्या का समाधान नहीं करवा पाते हैं,एक तरफ मोदी सरकार घर घर पानी स्वच्छता का मिशन सम्पूर्ण देश मे चला रही है, ऐसे में आज के समय मे भी पानी की एक -एक बून्द को मोहताज सैकड़ों गांव आज भी केवल उम्मीद ही लगाए बैठे हैं कि एक दिन गाँव में पेयजल पहुचेगा!देहरादून और ऋषिकेश में बैठ पलायन पर भाषण देने बहुत से लोग खड़े हो जाते हैं,पलायन आयोग भी सरकार ने बना दिया है, ये आयोग भी सिर्फ रिपोर्ट देने के सिवाय कोई काम नहीं करता, जब गांव खाली हो जाता है,तब जाकर बताता है कि गाँव खाली क्यों हुआ? उनकी नींद भी सही समय पर नही खुलती है,आयोग वाले गांव जाएंगे और गाँव से पलायन कर चुके ग्रामवासियों के अलावा रह रहे चन्द लोगों से,जो किसी कारणवश शहर नहीं जा सके,से पूछेंगे कि आपके गांव में समस्या क्या है और पूछकर अपनी रिपोर्ट सौंप देंगे मुख्यमंत्री जी की टेबल पर कि जी पलायन आयोग अपना काम ईमानदारी से कर रहा है,अब कोई पलायन आयोग से ही पूछे कि अगर समय पर समस्याओं का निवारण किया होता तो आज पलायन इतनी बड़ी समस्या न बना होता, कि आज पहाड़ की दुर्दशा का मूल कारण बन गया है,गाँव के अधिकांश लोग पानी, सड़क जैसी मूलभूत समस्याओं के कारण आज ऋषिकेश या नजदीकी शहर जाने को मजबूर हैं,परंतु पहाड़ में समस्या का निवारण करने को आज भी आदमी,नेता नहीं मिल रहे हैं,अब भोली-भाली जनता करे भी तो क्या करे?अपनी फ़रियाद लगाये भी तो किस से?ऐसे ही कुछ हालात हैं यमकेश्वर ब्लॉक के ऋषिकेश से मात्र बीस किमी दूरी पर स्थित दुर्गम गावों में से एक बुकण्डी गांव के भी,बुकण्डी गांव बरसात में बीन नदी में  पानी की अधिकता के कारण ऋषिकेश से कटा रहता है, ऐसे मे भगवान न करे कोई घटना घट जाए तो ऋषिकेश पहुंचना भी भगवान भरोसे ही रहता है,पेयजल की समस्या से जूझते बुकण्डी गांव के लोगों को नौ किमी लंबी खड़ी चट्टानों से गुजरती हुई पेयजल लाइन की मरम्मत करने में पसीने छूट जाते हैं,गांववासी मिलकर आज भी स्वयं के प्रयासों से अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं,निजी योगदान से काम चलाते बुकण्डी गांव वासी आज भी जल संस्थान के अधिकारियों से आस लगाए बैठे हैं कि कभी तो ये लोग नींद से जागेंगे और पानी की समस्या का निवारण करेंगें,पानी की कमी के कारण कैसे शौचालयों का उपयोग किया जाए यह कोई बताएगा?एक तरफ सरकार शौचालय बनाने के लिए पैसा दे रही है पर पानी की कहाँ से व्यवस्था होगी,यह कोई नही जानता।सौ परिवारों का यह गांव जिसकी आबादी 500 के लगभग हैं,इसमें से भी कितने ही बेसहारे बीमार बुजुर्ग भी हैं,जो चल फिर भी नहीं पाते,गांव में अधिकांश महिलाएं एवम बुजुर्ग ही रह रहे हैं,पशुओं के लिए पानी नही होने के कारण लोग पशु पालना भी छोड़ रहे हैं,जब इंसान के लिए ही पानी नही है तो पशुओं की प्यास भला कैसे बुझाएंगे?बुकण्डी गाँव को 1997 में उत्तरप्रदेश सरकार की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में अम्बेडकर गाँव घोषित कर सड़क मार्ग से जोड़ने का प्रयास किया गया था,मगर उत्तराखण्ड बनने के बाद सड़क भी सौ मीटर निर्माण से आगे नहीं बढ़ पायी, जिस वजह से ग्रामीणों को 5-6 किलोमीटर पैदल चल कर,गाड़ी बुक करनी होती है क्योंकि गाँव तक रेगुलर बस का टैक्सी सर्विस भी उपलब्ध नहीं है,बुकण्डी गांव में दो आंगनबाड़ी भवन ,दो प्राथमिक विद्यालयों के साथ ही एक जूनियर हाई स्कूल भी मौजूद है,पानी की कमी के कारण मध्यान्ह भोजन योजना भी बड़े स्तर से प्रभावित हो रही है।जिसपर कोई भी ध्यान देने वाला नही दिखता। यमकेश्वर विधानसभा का यह गांव उन बड़े गांवो में से है,जिनकी आबादी पाँच सौ के लगभग है या कहें कि यहां पलायन कम हुआ है,लोग आज भी सरकारी मदद की आस लगाए बैठे हैं कि हालातों में सुधार होगा,देखते हैं कब और कितने समय बाद यमकेश्वर क्षेत्र के जन प्रतिनिधियों की नींद खुलती है या ऐसे ही चलता रहता है और बाद में फिर पलायन आयोग गांव जाएगा और रिपोर्ट भेजेगा कि मुख्यमंत्री जी फ़लां गांव से पलायन हो चुका है,अब पलायन आयोग या सरकार को आइना दिखाने का यह सही वक्त है कि इस गांव की यह मूलभूत समस्याओं को सरकार के सामने रखा जाये और मूलभूत समस्याओं का निवारण शीघ्र करवाया जाए।

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